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आंचलिक धरोहर को बखूबी सँजोता रेणु का मैला आँचल

At the end of 2025, one good thing was that I finished reading another book—Maila Aanchal by Phanishwar Nath Renu. Although it reflects my own village and society, I had never read it before. My village is next to Renu’s, and the novel is set in our region. Renu is widely admired for his effective use of local dialect and regional language in his writing.

2025 के अंत में कुछ दिनों की अच्छी बात यह रही कि मैं एक और किताब पढ़ गया। हालांकि यह मेरे घर और समाज की कहानी है, फिर भी मैं अब तक इसे नहीं पढ़ पाया था। यह थी फणीश्वर नाथ रेणु की ‘मैला आँचल’। हमारा गाँव रेणु जी के गाँव के बगल में ही है और ‘मैला आँचल’ की पृष्ठभूमि हमारा क्षेत्र ही है। रेणु जी अपने लेखन में आंचलिक बोल-चाल की भाषा का बखूबी इस्तेमाल करते हैं और इसके लिए उन्हें खूब सराहा जाता रहा है।

इस किताब को पढ़ना टाइम ट्रैवल करने जैसा है। यह हमें उस दौर में ले जाती है जो हमारे पापा-दादा ने जिया है। कुछ हद तक हमने भी देखा है, और शायद वे सभी लोग इससे जुड़ पाएंगे जिन्होंने ग्रामीण परिवेश को नजदीक से देखा है। आजादी के संघर्ष के सामाजिक और राजनीतिक उतार-चढ़ाव और ग्रामीण जीवन पर इसके प्रभाव को रेणु ने खूबसूरती से बताया है। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सभी अपने समाज और गाँव को बचाने के लिए एक साथ खड़े होते हैं ।

ऐसा नहीं है कि रेणु जी ने गाँव के बारे में सिर्फ अच्छी बातें लिखी हैं। उन्होंने सब कुछ ज्यों का त्यों रखा है—वह भी उन्हीं की भाषा में जो वे बोलते थे, गाते-बजाते थे, जीते थे। सामाजिक प्रथाएं, कुरीतियाँ, जमींदारी, भेदभाव के बीच गाँव के लोगों की आत्मीयता, भोज-भात, कीर्तन-कुश्ती—सब कुछ सबको जोड़कर रखता है।

हम शहर और गाँव की तुलना करते रहते हैं, पर यह किताब हमें फिर से सोचने पर मजबूर करती है कि हम क्या खो रहे हैं। शहरीकरण अच्छा है, पर किस कीमत पर?

अगर मौका लगे तो जरूर पढ़ें। इसमें प्रेम है, करुणा है, और सामाजिक-राजनीतिक टकराव भी है। आपको पसंद आएगी।

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